Thursday, 19 November 2015

बन्ना का ज्ञान

जिंदगी की इम्तेहाऩ तो बहोत हुई, बन्ना !
शिकस्त मिली तो भी धीरे धीरे |

वो बेमाया-ओ-असबाब तो ऐसे ही बन बैठे,
जैसे ढो रहे हो गम़ दुनिया की तन्हाईयों का |

जीना जमाने में कुछ खास नही है ए- बन्ना !
दुनिया में हम तो बस तन्हा ही रह गए |

बोले, तुम हो मुसाफ़िर इस समंदर के,
डूबना तो कभी बनता नही तुम्हारी फ़ितरत में |

क्या करे इस दुनिया ने बे़गाना कर दीया,
अपनो ने ही बन्ना ! अफसाना कर दीया |

करो एक फसाना तुम भी इस जमाऩे मे !
झुके लोग, झुके दुनिया; तुम्हें भी बनाये वो बन्ना |