Thursday, 8 October 2015

न जाने ! अैसा क्यों हुआ ?

आज फिर मन मे एक आग लगी,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?
बात करने की मेरी उससे आरजू जगी,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?

जहाँन मे आकर वो दूर चला गया,
लेकीन इतना भी दूर ना हुआ |
पास रहकर ही मुझे है सताया,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?

उढते-जागते, चलते-ऊछलते,
तुम ही मेरे हमसफर बन रह गऐ |
आज दूर जाने की फिर तमन्ना है जगी,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?

बातो ने तेरी मुझे हसाया,
रूलाया भी उन्होने ही है मुझे |
पर न जाने आज ये लिखने का मन कर रहा,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?

यह दिल ही तो है जो सँभला है,
पर तेरी यादों ने ये क्या किया ?
गिला है , शिकवा है किन्तु कोई ना दुश्मनी,
पर फिर भी ! न जाने अैसा क्यों हुआ ?

5 comments:

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    1. आप जैसे दोस्तो के लिए ही...

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  3. Replies
    1. बहोत बहोत धन्यवाद भाई

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