Tuesday, 6 October 2015

भारतवर्ष


रक्त-रंजीनी आज फिर है सजी,
शृंग-गर्त सी धून मन में है बजी |
खड़ग के खयाल ने है यह पाया,
बंदूक से उस खून को था खोया ||

मासूमीयत सी मुश्कान मे भी मिली,
घडी़ संकट कू आज है टली |
शत्रु ने भी जाना है आज यह मूल्य,
घबराये तुम तो हम भी हैं अतुल्य ||

भारतवर्षे विनम्रता, विविधता, विशेषता,
ह्रदय के टुकडे सी है यही कोमलता |
अनेक को जाना, पर मिला ना एक,
राष्ट्र ही हो वह, किन्तु हजारों मे नेक ||

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