Sunday, 25 October 2015

क्षत्राणी

मै दुर्गा की जयेष्ट-पुत्री,क्षात्र-धर्म की शान रखाने आई हूँ !
मै सीता का प्रतिरूप ,सूर्य वंश की लाज रखाने आई हूँ!1!



मै कुंती का अंश लिए ,चन्द्र-वंश को धर्म सिखाने आई हूँ !
मै सावित्री का सतीत्त्व लिए, यमराज को भटकाने आई हूँ !२!

मै विदुला का मात्रत्व लिए, तुम्हे रण-क्षेत्र में भिजवाने आई हूँ ! मै पदमनी बन आज,फिर से ,जौहर की आग भड़काने आई हूँ !३!



मै द्रौपदी का तेज़ लिए , अधर्म का नाश कराने आई हूँ !
मै गांधारी बन कर ,तुम्हे सच्चाई का ज्ञान कराने आई हूँ !४!

मै कैकयी का सर्थीत्त्व लिए ,तुम्हे असुर-विजय कराने आई हूँ ! मै उर्मिला बन ,तुम्हे तुम्हारे क्षत्रित्त्व का संचय कराने आई हूँ !५!



मै शतरूपा बन ,तुम्हे सामने खडी , प्रलय से लड़वाने आई हूँ! मै सीता बन कर ,फिर से कलयुगी रावणों को मरवाने आई हूँ!६!

मै कौशल्या बन आज ,राम को धरती पर पैदा करने आई हूँ ! मै देवकी बन आज ,कृष्ण को धरती पर पैदा करने आई हूँ !७!



मै वह क्षत्राणी हूँ जो, महा काळ को नाच नचाने आई हूँ !
मै वह क्षत्राणी हूँ जो ,तुम्हे तुम्हारे कर्तव्य बताने आई हूँ !८!

मै मदालसा का मात्रत्त्व लिए, माता की महिमा,दिखलाने आई हूँ ! मै वह क्षत्राणी हूँ जो ,तुम्हे फिर से स्वधर्म बतलाने आई हूँ !९!



हाँ तुम जिस पीड़ा को भूल चुके, मै उसे फिर उकसाने आई हूँ ! मै वह क्षत्राणी हूँ ,जो तुम्हे फिर से क्षात्र-धर्म सिखलाने आई हूँ !१०!

Monday, 19 October 2015

राही तेरी राह

चलता रहेता तु ही है राही,
पर मैंने भी चलना है जाना |
दूर से दिखाई दे रहा है वह,
मकसद मेरा सिर्फ उसको है पाना ||

अड़ग राह की यह मंजिल है,
सात समंदर सा यह अंतर है |
जिंदगी का उफान यह दुवीधा सा,
देशभक्त दिवाना मेरा देश अैसा ||

बुलंदीयो को है एक बार छुना,
पर ना कभी उससे मुकरना |
ले जाऊँगा एक दिन मैं उसे आगे,
भले पथ पर हो मुश्केली सदासे ||

आशाऐं बहोत है तुमसे एे-दोस्त,
तुम ही तो हो मेरे ऐ-सरफरोश !
दास्ताँन लिखी जाएगी एक बार,
इस लिए जिना हैं हमें बार बार ||

Thursday, 8 October 2015

न जाने ! अैसा क्यों हुआ ?

आज फिर मन मे एक आग लगी,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?
बात करने की मेरी उससे आरजू जगी,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?

जहाँन मे आकर वो दूर चला गया,
लेकीन इतना भी दूर ना हुआ |
पास रहकर ही मुझे है सताया,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?

उढते-जागते, चलते-ऊछलते,
तुम ही मेरे हमसफर बन रह गऐ |
आज दूर जाने की फिर तमन्ना है जगी,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?

बातो ने तेरी मुझे हसाया,
रूलाया भी उन्होने ही है मुझे |
पर न जाने आज ये लिखने का मन कर रहा,
न जाने अैसा क्यों हुआ ?

यह दिल ही तो है जो सँभला है,
पर तेरी यादों ने ये क्या किया ?
गिला है , शिकवा है किन्तु कोई ना दुश्मनी,
पर फिर भी ! न जाने अैसा क्यों हुआ ?

Tuesday, 6 October 2015

भारतवर्ष


रक्त-रंजीनी आज फिर है सजी,
शृंग-गर्त सी धून मन में है बजी |
खड़ग के खयाल ने है यह पाया,
बंदूक से उस खून को था खोया ||

मासूमीयत सी मुश्कान मे भी मिली,
घडी़ संकट कू आज है टली |
शत्रु ने भी जाना है आज यह मूल्य,
घबराये तुम तो हम भी हैं अतुल्य ||

भारतवर्षे विनम्रता, विविधता, विशेषता,
ह्रदय के टुकडे सी है यही कोमलता |
अनेक को जाना, पर मिला ना एक,
राष्ट्र ही हो वह, किन्तु हजारों मे नेक ||